Successful Indian - successfullindian

नाम - डॉ अभिजीत देशमुख

पद - लेप्रोस्कोपिक सर्जन

जन्म तिथि - 5 मार्च 1967

स्थान - भोपाल

छोटे शहर के मध्यमवर्गीय परिवार में कमजोर आर्थिक स्थिति के बीच जन्म लेने और पले-बढ़े होने के बावजूद आप अपनी उम्मीदों के अनुरूप सफलता प्राप्त कर सकते हैं। शुजालपुर से जुड़े लेप्रोस्कोपिक सर्जन डॉ. अभिजीत देशमुख की कहानी युवाओं को यह बात सिखाती है। खुद पर भरोसा रखें और ईमानदारी से मेहनत करें तो जीवन में वो सब कुछ पाया जा सकता है जो आप समझते हैं कि बड़े शहरों में रहकर, बड़े स्कूल में पढ़कर मिल सकता है। डॉ. देशमुख आज देश के जाने माने लेप्रोस्कोपिक सर्जन हैं। भोपाल व उसके आसपास के शहरों में पहली बार लेप्रोस्कोपिक से सर्जरी करने का गौरव इन्हें प्राप्त है। डॉ. देशमुख की पत्नी अब प्री-मेडिकल टेस्ट के लिए कोचिंग देते हैं और उनकी बेटियां खुद डॉक्टर बनने की राह पर अग्रसर हैं।
डॉ. अभिजीत देशमुख का जन्म महाराष्ट्र के कोल्हापुर में पांच मार्च 1967 में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा भी वहां हुई। इसके बाद की शिक्षा म.प्र के शाजापुर में हुई। इनके पिताजी सरकारी शिक्षक थे और परिवार के साथ कोल्हापुर से शुजालपुर स्थानांतरित हो गए। कोल्हापुर में डॉ. देशमुख के परिजन राजनीति में भी सक्रिय थे। वे वहां प्रारंभिक शिक्षा के लिए शहर के बड़े स्कूल में भर्ती हुए थे, लेकिन पिताजी के म.प्र के शुजालपुर में आने से यहां उन्हें उस स्तर का स्कूल नहीं मिला। इसी स्कूल में बाकी की पढ़ाई पूरी हुई।
शुजालपुर में जब इन्हें स्थानीय स्कूल में भर्ती कराया तो शुरुआत में अच्छा नहीं लगा। पढ़ाई भी कोल्हापुर के स्तर की नहीं हो पा रही थी। शुरुआत में अन्य किसी बड़े शहर में जाकर अच्छे स्कूल में भर्ती होने का मन बनाया, लेकिन आर्थिक स्थिति के कारण ऐसा नहीं हो सका। ऐसे में देशमुख जी ने खुद ही तय किया कि छोटे स्कूल में भी अच्छा कर सकते हैं और इसी भावना ने उन्हें आगे बढऩे-पढऩे की प्रेरणा दी। डॉ. अभिजीत ने आत्म विश्वास को मजबूत बनाए रखा।
देशमुख ने हायर सेकंडरी उत्तीर्ण करने के पहले ही डॉक्टर बनने का तय कर लिया था। उन्हें अपने आसपास के अन्य डॉक्टरों से प्रेरणा मिली। वे उनकी ही तरह समाज की सेवा करने वाला प्रोफेशन अपनाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने पीएमटी की तैयारी कर परीक्षा दी और अच्छे अंकों से उसमें सफल भी हुए। 12वीं (हायर सेकेंडरी) होलकर साइंस कॉलेज से की। यहीं पर मेडिकल की परीक्षा की तैयार की। एमबीबीएस में चयन हुआ तो एक साल ग्वालियर मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई की, इसके बाद भोपाल स्थानांतरण कराया।
देशमुख ने 1992 में एम बी बी एस किया और वे एमएस करना चाहते थे। एम बी बी एस के तुरंत बाद ही घर वालों ने उनकी शादी करा दी। वे शादी के बाद सभी परिवार की जिम्मेदारियों को संभालने की कोशिश कर ही रहे थे कि एमएस के नियम बदल गए। उन्हें इसकी परीक्षा पास करनी थी, जिसके लिए सिर्फ एक माह का समय था। घर-परिवार चलाने के बीच एमएस प्रवेश परीक्षा की तैयारी करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। उन्होंने दोनों चुनौतियों को स्वीकारा और सफल हुए।
डॉ. देशमुख ने पढ़ाई के दौरान ही दूरबिन आधारित सर्जरी की नई तकनीक लेप्रोस्कोपिक सर्जरी में विशेषज्ञता हासिल करने की ठानी। इसके लिए वे मुंबई में एक्सपर्ट डॉ. श्रीखंडे के साथ रहे। यहां इन्होंने इस सर्जरी को सीखा- समझा और भोपाल आए। भोपाल व आसपास के शहरों के लिए ये एक नई तकनीक थी। करीब चार साल मेहनत की। लोन लेकर मशीनरी व अन्य संसाधन जुटाए। भोपाल के अस्पतालों ने तवज्जों नहीं दी तो आसपास के छोटे शहरों के अस्पतालों में इस सर्जरी से लोगों का इलाज किया। जब प्रसिद्धि बढ़ी तो भोपाल के बड़े अस्पतालों ने डॉ. देशमुख को अपने यहां बुलाना शुरू किया। बिना चीर-फाड़ ऑपरेशन की नई तकनीक का लाभ हजारों लोगों ने लिया।

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डॉ. देशमुख ने एक वृद्ध महिला का इलाज किया। सर्जरी की और बीमारी दूर की। ठीक होने के बाद वह महिला लौट गई। पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद एक दिन महिला अपने नाती-पोतों के 15 सदस्यों से अधिक बड़े परिवार के साथ अस्पताल आई। डॉ. देशमुख को बहुत धन्यवाद देकर दस-दस रुपए के दस नोट दिए, शुभकामनाएं दीं। देशमुख इसे अपना सबसे बड़ा और अच्छा पुरस्कार मानते हैं।
डॉ. देशमुख का कहना है कि उन्होंने कभी अपने व्यक्तिगत जीवन और व्यवसायिक जीवन को एक दूसरे पर हावी नहीं होने दिया। समय का प्रबंधन कुछ ऐसा किया कि परिवार को भी गुणवत्ता वाला समय मिला। बतौर डॉक्टर अपने मरीजों को भी पूरी तरह संतुष्ट रखा। उनका कहना है कि हर दिन मेडिकल साइंस में नवाचार होते हैं और इसके तहत खुद को भी अपडेट रखते हैं। वर्कशॉप व अन्य माध्यमों से नई चीजें हमेशा सीखते रहते हैं। देशमुख का कहना है कि उनके पेशे में खुद को हमेशा सबसे आगे रखने और अपना नाम बनाए रखने की चुनौती होती है, लेकिन कभी भी खुद को पहचान के संकट के दबाव में नहीं आने दिया।
डॉ. देशमुख मेडिकल की दुनिया में बड़ा नाम कमाने के बावजूद समाज से दूर नहीं हैं। अपने जन्मस्थान से लेकर पढ़ाई वाले स्थान तक के लोगों के बीच जाकर चिकित्सा शिविर और अन्य माध्यमों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। देशमुख ने अपने माता-पिता के सामने ही उनके नाम से शिविर आयोजित किए और लोगों का इलाज किया। गांव में जाकर लोगों से उनकी सेहत के बारे में पूछताछ कर उन्हें स्वास्थ्य सुविधा-सुझाव देने में कभी कोताही नहीं की। प्रदेश के मातृ-शिशु मृत्यु दर पर लगाम कसने के लिए डॉ. देशमुख ने कॉलेज जाने वाली प्रदेश की छात्राओं के पोषण की जांच कराई और सरकार के साथ मिलकर पोषण के प्रति जागरूकता कार्यक्रम किए, ताकि जब वे मां बने तो पोषण की कमी से उन्हें कोई शारीरिक दिक्कत न आए। यहीं काम स्कूल जाने वाले बच्चों को लेकर भी किया।

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डॉ. अभिजीत देशमुख का कहना है कि आप जीवन में कितने सफल हुए हैं, उसके लिए तीन सवालों को पैमाना बनाएं। सबसे पहले ये देखें कि आपने अपने जीवन को लेकर जो लक्ष्य तय किए थे वे कितने पूरे हुए? आप अपने परिवार को कैसा जीवन दे पा रहे हैं? इसके साथ ही ये भी देखें कि समाज की सेवा कितनी और किस तरह से कर रहे हैं? इनके आधार पर ही तय होगा कि आप कितने सफल हुए या असफल रहे। डॉ. देशमुख अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता की दूर दृष्टि, बड़ी सोच व संस्कारों के साथ मुंबई में उन्हें लेप्रोस्कोपिक सर्जरी की सीख देने वाले डॉ. श्रीखंडे को देते हैं। डॉक्टर बनने की सोच रहे युवाओं को देशमुख कहते हैं कि आत्म विश्वास के साथ ईमानदारी, मेहनत को मिलाकर काम करें। अपना उद्देश्य, स्पष्ट व धैर्य भी रखें। उनके अनुसार सफलता मिलने के बाद भी खुद को विनम्र बनाए रखें तो सफलता के साथ आपको संतुष्टि भी मिलेगी।
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