Successful Indian - successfullindian

नाम - बाबूलाल दहिया

जन्म - 10 फरवरी 1944

जन्म स्थान - ग्राम पिथौराबाद

व्यवसाय - किसान

कृषि मात्र एक शब्द नहीं बल्कि किसान कि पहचान है ,किसानों को कृषि एवं अन्नदाता कहा जाता है। कृषि की नींव को किसान द्वारा ही प्रतिपादित किया गया है इसलिये अनाज का कण - कण उनके जीवन का सर्वमान्य भाग माना जाता है । इन्हीं सर्वोच्च किसानों में से एक हम जिस महापुरुष से परिचित होने जा रहे है उनका नाम बाबूलाल दहिया है ,बाबूलाल ने धान और सब्जियों की 100 प्रकार की किस्में उगाई हैं, उन्होंने चावल की 10 प्रजातियों के साथ शुरुआत की साथ ही अब सतना में अपने कृषि क्षेत्रों में चावल के प्रजातियों की 80 से अधिक किस्मों का संरक्षण करते हैं।और अब उनके पास 2 एकड़ की जमीन है जहां 200 पारंपरिक किस्में है साथ ही गेहूं के14-15 प्रकार की किस्में है । इन्होंने सफलता का रास्ता स्वयं तय किया और भारत सरकार द्वारा बाबूलाल को 2019 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
बाबूलाल दहिया का जन्म 10 फरवरी 1944 को मध्यप्रदेश के (सतना जिले) से दूर 12 किलो मीटर पुथोरबाद गांव में हुआ। मिट्टी और फसलों के साथ बचपन से ही जुड़े रहने वाले बाबूलाल किसान घराने से सम्बन्ध रखते है पहले के समय में बच्चे अपने परिजनों के कार्यो में आसानी से सम्मिलित हो जाते थे इसी तरह इन्होंने अपने पिता की सहायता से खेती के कार्य को गहराई से समझा और तकनीकियां सीखने में अपनी रुचि व्यक्त की। पुरातन काल में लिखा -पढ़ी का लेखा जोखा न होने के कारण 5 वी तक की शिक्षा गांव में की, बिना संकोच के आगे बढ़ते रहे और 12वी तक की शिक्षा सतना में पूरी की,साथ ही प्राइवेट से (बी. ए) भी किया। ये वो दौर था जहां लोगो में शिक्षा के प्रति जागरूकता नहीं थी इसके उपरान्त बाबूलाल शिक्षा पथ पर चलते रहे एवं आगे चलकर इन्हें पोस्ट मास्टर का पद हासिल हुआ।
बघेली जन जातीय भाषा बोलने वाले बाबूलाल दहिया की अभिरुचि साहित्य से जुड़े तथ्यों में भी है ,मुहावरे कहावतें,लोक-गीत,लोकोक्तिया,कविताओं से इनका आज भी गहरा सबंध है। इसी के साथ वे कविता की बैठक एवं प्रदर्शन में भाग लेते रहे। वक्त बिता, फिर मध्य प्रदेश आदिवासी लोक कला अकैडमी में शामिल हो गए। अकैडमी के कार्यकर्ताओं ने उनसे अपनी संस्कृति को बनाए रखने के लिए बघेली लोक-साहित्य, कहावतें, लोककथाएँ, मिथक आदि का दस्तावेजीकरण करने का अनुरोध किया। बाबूलाल,जो पहले से ही बघेली साहित्य के बारे में भावुक थे, इन्होंने बघेली मौखिक लोक साहित्य पर 5 किताबें लिखीं और 2 काव्य संग्रह प्रकाशित किए। बाबूलाल ने एक सर्जना सामाजिक संस्कृत और साहित्य मंच का भी गठन किया है , इसके माध्यम से वे पारंपरिक बीज किस्मों का प्रचार और उसकी जानकारी देते है।
बाबूलाल जी ने बात-चीत के दौरान बघेली में एक कहावत कहीं । "धान बोइये करवी , सूअर खाये न समधी " अर्थात (अगर आप कड़वी चावल की किस्म बोते हैं, तो इसे न तो जंगली सूअरों द्वारा खाया जाता है नहीं दमाद द्वारा ,सुअर इसलिए नही खाता क्योंकि कि करगी धान की बाल में सेंकुर " काँटे" होते है।और समधी " बेटी का ससुर" इसलिए नही खाय गा क्योंकि उसका चावल लाल और मोटा होता है)।क्योंकि समधी को लोग पतला सुगन्धिक चावल खिलाते है । तात्पर्य यह है की इन किस्मों में छोटे सुरक्षात्मक स्पाइक्स होते हैं और इसलिए सूअर इन्हें नहीं खा सकते हैं।" मेरे मुहावरे - कहावतें सिर्फ किताब तक ही सिमित नज़र आ रहे है, इनसे जुड़े लक्ष्य और तथ्यों को लोगो तक पहुंचाना " उतना ही महत्वपूर्ण है जितना पानी की बर्बादी को बचाना" वे आगे बताते है कि बोना साइज (छोटे आकार की धान )ज्यादा पानी पीता है।और देसी बीज़ की धान कम पानी पीता है। इन्होंने बीज के गुणों का गहराई से अध्ययन किया है पारंपरिक चावल की किस्मों के गुणों के बारे में बात करते हुए, बाबूलाल कहते हैं कि हर एक का स्वाद अद्वितीय है यही कारण है कि किसानों को इनकी अच्छी कीमत मिलती है। गोबर को खाद के रूप में उपयोग करने से कई प्रकार के पारंपरिक चवालों की पर्याप्त प्राप्ती की जा सकती है । इसके विपरीत,संकर और बोनी किस्मों को रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता होती है। यह आदानों को बढ़ाता है और भूमि या मिट्टी की उर्वरता को कम करता है, अथवा बाबूलाल का यह मानना है की नई खेती से कोई लाभ नहीं है क्योंकि जब उत्पादन बढ़ता है तब मोल घटता है, और ज्यादा उत्पादन बढ़ने पर किसान उसे फेक देता है या फिर उसका उपयोग शराब बनाने मे होता हैं। इस प्रक्रिया से हमारे देश को लाभ नहीं है।

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ज़िक्र प्राचीन काल का (वर्ष 1965 )का किया जब हरित क्रांति आयी ,उस समय लोगो की निर्भरता किसानों पर बढ़ने लगी थी ,और तभी से धीरे- धीरे देश से देसी बीजों का विलुप्त होना शुरू हो गया था। बाबूलाल दहिया के लिए चिंता का विषय है "पारंपरिक बीज का विलुप्त होना "। इसका हल इन्होंने जल्द ही खोज निकाला और मध्यप्रदेश के 40 जिलों में यात्रा की (रीवा, सतना, शेडोल आदि ) के ग्रामीण क्षेत्रों से बीज एकत्रित किए, जिसमे 110 प्रकार की धान 90 किस्में एकत्रित किया । इस यात्रा का मुख्या उद्देश्य " बीज बचाओ खेती बचाओ "अथवा धन की किस्मे बचाना है, 2005 में, बाबूलाल ने उन चावल की किस्मों को सहेजने का मिशन प्रारम्भ किया था उसी समय से कई स्वदेशी फसलों, सब्जियों पर शोध और सूचीबद्ध करना शुरू किया। इन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर किसानों से बीज एकत्रित करना शुरू किया यह कोशिश से उनके आगे के रास्ते खुले और बीज बैंक का निर्माण हुआ। बाबूलाल दहिया ने स्वयं खुद के घर में मध्यप्रदेश शासन (किसान भवन ) के द्वारा बीज बैंक बनाया है जिसमें वह बीज जमा करते है और जरूरत पड़ने पर किसानों को पारंपरिक बीज प्रदान करते है हर साल वह अपने खेत में इन {कृषि-बचा}बीज को बोता है और उनका अध्ययन करने के बाद बिना किसी उर्वरक का उपयोग किए पारंपरिक फसल की किस्में उगाते है। बाबूलाल के काम से प्रेरित होकर, जैव विविधता बोर्ड ने सब्जियों और औषधीय पौधों की स्वदेशी किस्मों को इकट्ठा करने के लिए एक बीजे यात्रा शुरू की है। अब तक, उन्होंने 24 जिलों से 1600 से अधिक किस्मों को एकत्र किया है।
बीजों को सुरक्षित रखने के लिए बीज बैंक की स्थापना की है।कृषि भूषण से सम्मानित।(मध्यप्रदेश) राज्य जैव बिबिधता बोर्ड भोपाल ने बीज बैंक की शुरुवात की है।इसके निर्देशन रायपुर कृषि विश्व विद्यालय के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ दीपक शर्मा है उच्च उपज प्राप्त करने के लिए गुणवत्ता वाले बीज की उपलब्धता आवश्यक है इसलिए अच्छी गुणवत्ता वाले बीज कृषि में अन्य सभी आदानों की क्षमता को साकार करने के लिए उत्प्रेरक का काम करता है। एक उन्नत बीज कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए सबसे किफायती साधन है और किफायती इनपुट भी। यह तथ्य कि आनुवंशिक रूप से शुद्ध बीज अकेले फसल उत्पादन में 20 प्रतिशत की वृद्धि कर सकते हैं और कई खतरे के खिलाफ प्रतिरोध प्रदान कर सकते हैं, कृषि में इस मूल इनपुट के महत्व को बताता है।
ग्लोबल वार्मिंग एक ऐसा शब्द है जिससे लगभग हर कोई परिचित है इसका अर्थ अभी भी हम मे से अधिकांश के लिए स्पष्ट नहीं है। बाबूलाल ने पर्यावरण की जरुरत को समझते हुए बताया की फसले ग्लोबल वार्मिंग को रोकने में सक्षम है कृषि और मत्स्य पालन जलवायु पर अत्यधिक निर्भर है। तापमान में वृद्धि और कार्बन डाइऑक्साइड कुछ स्थानों पर फ़सल की पैदावार को बढ़ा सकता है,क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग समस्या तेज़ी से बढ़ती जा रही है ,जिस पर अभिवाजित ध्यान देने की आवश्यकता है.बाबूलाल दहिया के इस महत्वपूर्ण कदम मे आगे बढ़ने का कारण साफ़ पता चलता है की वह पर्यावरण के प्रति चिंतित है और अपनी इस कोशिश से ग्लोबल वार्मिंग को रोकने का प्रयास कर रहे है।
बाबूलाल दहिया ने कृषि शिक्षा के प्रति अपनी रूचि दिखते हुए निष्ठा के साथ सफलता को प्राप्त किया। इसी सफलता के रहस्य से आज उनका कार्य कृषि क्षेत्र में विवेक मान हैं। इनके द्वारा की गई सकर्मक क्रिया कृषि के प्रति उल्लेखनीय है। बाबूलाल दहिया की मेहनत और लगन आज के युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक स्त्रोत्र है।

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जिस प्रकार से बाबूलाल ने पारंपरिक बीज बचने बचाने का संकल्प लिया था अतः कड़ी कठिनाइयों के बाद उनका यह संकल्प पूरा हुआ।गाँव का निरीक्षण करते समय बहुत से परेशानियों का सामना करना पड़ा इसके उपरान्त उन्होंने मेहनत के साथ परंपरा को बचाए रखा अथवा पारंपरिक बीज को शुभायमान रखा।
कुछ लोग जिस क्षेत्र में काम करते हैं, उसमें नित-नए प्रयोग कर इतनी कामयाबी हासिल कर लेते हैं कि दूसरों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन जाते हैं। ऐसी ही एक शख्सियत हमारे समाज मे बाबूलाल दहिया हैं,जिन्होंने साबित कर दिखाया की कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता है। मेहनत और लगन से कोई भी कार्य सफलता पूर्वक किया जा सकता है। बाबूलाल ने कृषि यंत्रों का बेहतर उपयोग कर सराहनीय कृषि प्रदर्शन किया अथवा अनुभव के आधार पर कृषि को स्वावलंबी और बेहतर आमदनी प्रदान करने वाला व्यवसाय बनाने का प्रयास किया।बाबूलाल के द्वारा अपनाई गई कृषि तकनीक न केवल परिस्थितियों के लिए अनुकूल है, बल्कि वातावरण के लिए उपयुक्त और कम खर्चीली होने के साथ-साथ किसानों को अतिरिक्त आमदनी देने वाली है। उनका कहना है कि कृषि का क्षेत्र अत्यधिक गहन क्षेत्र है। यहां निरंतर कुछ न कुछ सीखने को मिलता है और अपेक्षाकृत बेहतर आमदनी का आधार बनता है।
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