Successful Indian - successfullindian

नाम - नरिंदर सिंह

पद - किसान (एप्पल मैन ऑफ़ हरयाणा)

जन्म तिथि - 22 जून 1964

स्थान - हरियाणा

आज देशभर के किसानों को जैविक खेती की सीख दे रहें, सेबफल से लेकर अनार, बदाम, चिकू, लिची तक उगा दिया, रोजाना 140 लीटर दूध और कई तरह की ऑर्गेनिक सब्जियां लोगों को उपलब्ध करा रहें भोपाल। खेती- किसानी वाकई लाभ का धंधा है। हरियाणा के करनाल में नर्सरी चलाने वाले किसान नरेंद्र सिंह के फॉर्म हाउस पर जाकर इसका अनुभव किया जा सकता है। लेबर लॉ ह्यूमन बिहेवियर विषय पर विशेषज्ञता करने वाले नरेंद्रसिंह का मन पढ़ाई लिखाई के बावजूद बागवानी में ही लगा रहा। यही वजह है कि परिवार की नाराजगी के बावजूद नौकरी छोड़ी और आज ये अपने 14 एकड़ के फार्म हाउस पर सेवफल, अनार से लेकर नींबू, चिकू, लिची यहां तक कि बादाम तक का उत्पादन कर रहे हैं। इन्हीं के बीच सब्जियां और पशुपालन भी हो रहा। हरियाणा में पहली बार सेबफल की खेती की और एप्पलमैन का खिताब पाया। आईसीएआर ने इनकी सफलता की कहानी अपनी पत्रिका में प्रकाशित की। इतना ही नहीं, आज नरेंद्रसिंह पंजाब, गुजरात, राजस्थान से लेकर कर्नाटक तक के किसानों को खेती किसानी के गुर बता रहे हैं। इनका विशेष ध्यान जैविक पद्दति से फल सब्जियों के उत्पादन पर हैं, ताकि देशवासियों को रसायनिक खेती के दंश से बचा सके।
नरेंद्र सिंह की उम्र अभी 56 वर्ष हैं। 22 जून 1964 को इनका जन्म हरियाणा के करनाल में हुआ। इन्हें बागवानी विरासत में मिली थी। पिता को बागवानी का शौक था जो नरेंद्र को भी लग गया। बचपन से ही पिता को वे बागवानी करते देखते और उनका साथ भी देते। फॉर्म हाउस में फल, सब्जियों, फसलों के बीच ही इनका बचपन बीता। आज ये नर्सरी देश को ऑर्गेनिक खेती की संदेशवाह के तौर पर काम कर रही है।
नरेंद्र सिंह जब कक्षा दूसरी में थे तो उनके स्कूल के पास किसी ने अंगूर के बेलों को काटकर फेंक दिया था। इसमें वे कुछ बेल लेकर अपने फार्म हाउस पर गए और वहां लगा दिया। बागवानी का शौक था ही। इनकी देखभाल की। अंगूर की खेती को लेकर कैसे काम किया जाए, इसके बारे में कई जगह से जानकारी लेते रहें और स्थिति ये बनी कि कक्षा दसवीं तक इन्होंने इन्हीं कुछ पौधों को बढ़ाते हुए एक एकड़ की खेती में बदल दिया।
नरेंद्रसिंह ने मधुमक्खी पालन में भी काफी नाम कमाया। अंगुर की अच्छी खेती करने के बाद जब ये कक्षा 11वीं में थे बागवानी के साथ शौकियांतौर पर मधुमक्खी पालन शुरू किया। हरियाणा सरकार द्वारा इसके लिए दिए जाने वाले प्रशिक्षणों में शामिल हुए और काम शुरू किया। मधुमक्खी पालन और शहद उत्पादन में इतनी काबिलियत प्राप्त की कि जब तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार ने अपने नर्मदा किनारे किसानों के लिए मधुमक्खी पालन का प्रोजेक्ट तैयार किया तो हरियाणा सरकार ने नरेंद्रसिंह को मधुमक्खी के बॉक्स गुजरात सरकार को आपूर्ति करने का मौका दिया। इन्होंने 1992 तक दो साल गुजरात सरकार को बॉक्स उपलब्ध कराएं।
नरेंद्रसिंह पढ़ाई के बाद काउंसलर्स की नौकरी पर लग गए थे। करीब डेढ़ साल नौकरी की, लेकिन उनका मन बागवानी में लगा रहा। डेढ़ साल बाद जब नौकरी छोड़ वे फार्म हाउस पर आए तो घरवाले नाराज हुए। अच्छी नौकरी छोड़कर खेती करने की जिद घरवालों की अच्छी नहीं लगी। उन्होंने नरेंद्र से दूरी बना ली। बाद में जब बागवानी में सफलता मिली और अच्छे परिणाम आए तो घरवालों को उनका निर्णय सही लगा।
नरेंद्रसिंह अपनी नर्सरी के पंजीयन के बाद सरकारी टूर पर पुणे गए। यहां ये अनार की गणेश प्रजाति के पांच पौधे हरियाणा में लाए। इसे विकसित किया और अच्छी फसल ली। अन्य पौधे बनाएं और हरियाणा जैसे राज्यों के किसानों को उपलब्ध कराए। इसी तरह जम्मू क्षेत्र के अखनूर में जब अपने रिश्तेदार के यहां गए तो देखा 47 डिग्री में यहां सेब की फसल अच्छे से हो रही हैं तो हरियाणा में भी हो सकती हैं। वे यहां से पौधे लाएं और खेती शुरू की। सफल हुए। आज देशभर में सेब और इसी तरह की प्रजाति के फलों के पौधों के साथ प्रशिक्षण भी देते हैं। हरियाणा में पहली बार सेबफल की खेती करने की वजह से करनाल में दो साल पहले एक हॉर्टिकल्चर के एक सम्मेलन में इन्हें एप्पलमैन की उपाधि दी गई। यहीं पर एफडीआरआई ने बेस्ट फॉर्मर के साथ बेस्ट बी कीपर का अवार्ड दिया।
नरेंद्र 18 साल से अपने फॉर्म हाउस पर वर्मी कल्चर कर रहे हैं। ये इतनी अच्छी तरह से करते हैं कि वर्मी कंपोस्ट बनाने में ये देश में अलग पहचान रखते हैं। कईं किसान इनसे प्रशिक्षण लेने पहुंचते हैं और निशुल्क प्रशिक्षण के साथ कुछ वर्मी भी देते हैं। इनका उद्देश्य ही यही है कि हर किसान इसका उत्पादन कर खेती में उपयोग करें तो बेहतर होगा। नरेंद्रसिंह बताते हैं कि बीते तीन साल से तो वे अपनी पूरी खेती, बागवानी ऑर्गेनिक कर रहे हैं। अभी लॉकडाउन में तो कवर्ड कॉलोनियों में पूरी तरह ऑर्गेनिक सब्जियों, दूध, घी व अन्य की आपूर्ति की थी।

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नरेंद्रसिंह अपनी खेती से जुड़ी तकनीक, जानकारियों को छिपाते नहीं है। उनका कहना है कि मैं सबके साथ खुली किताब की तरह रहता हूं और चाहता हूं कि हर किसान इसी तरह लाभवाली खेती करें। इसके लिए वे किसानों को फोन पर, अपने यूट्यूब चैनल के साथ ही वॉट्सएप ग्रुप से बागवानी की बारीकियां बताते हैं। सिंह का उद्देश्य ऑर्गेनिक वाली जहरमुक्त खेती को बढ़ावा देना है। वे अपने यहां किसानों के लिए हॉर्टिकल्चर की प्रदर्शनी, कार्यशाला करते हैं। अभी अप्रैल में ही उन्होंने इसकी तैयारी की थी, लेकिन कोराना की वजह ये टल गई। सिंह की बागवानी की सफलता से ऑल इंडिया रेडियो ने उनके कार्यक्रम कराएं और किसानों से सीधी बात कराई, ताकि उनके अनुभव का बाकी को भी लाभ मिल सकें।
नरेंद्र को बागवानी का शुरुआती प्रशिक्षण तो पिता से मिला, लेकिन नर्सरी शुरू करने की सलाह से लेकर मदद हॉर्टिकल्चर के अफसर एके एहलावत से मिली। एहलावत को वे अपनी नर्सरी और इसकी सफलता का श्रेय देते हैं। अब स्थिति ये हैं कि उनके यहां पौधों की बकायदा बुकिंग होती है और वे मांग पर कूरियर से भी पौधे भिजवाते हैं।
नरेंद्र को अपनी नर्सरी, बागवानी में कोई अधिक परेशानी तो नहीं आई, लेकिन वे खुद को तभी सफल मानेंगे जब उनके ही जैसे अन्य किसान देश में बन जाएंगे। खेती को हिन भावना से देखने वालों के सामने वे पूरी तरह से नई तरह की खेती रखकर नया दृष्टिकोण देना चाहते हैं। उनका कहना है कि हर जगह हर तरह की खेती की जा सकती है। वे ऐसा कर भी रहे हैं। अन्य को भी अब इसी सोच से काम करना चाहिए।
नरेंद्रसिंह का कहना है कि खेती किसी भी तरह से हानि का काम नहीं है। वे कहते हैं पढ़े लिखे युवा खेती में नए तरीकों से बेहतर कर सकते हैं। मैं मार्गदर्शन देने के लिए तैयार हूं। 30 साल से सबके लिए उपलब्ध हूं तो आगे भी रहूंगा। मैं चाहता हूं कि खेती को युवा भी समझे, उसे लाभ का धंधा बनाएं। वे चाहते हैं कि जो भी युवा खेती, बागवानी, हॉर्टिकल्चर में आएं, पूरी जानकारी साथ रखें। समय-समय पर खेती संबंधी मेलों, आयोजनों में नवाचारों को देखें, वे भी यहीं से नई चीजें लेते हैं। उनका कहना है कि मधुमक्खी पालन के समय एक गांव में एक किसान को कुछ बॉक्स दिए। वहां लगी फसल का मक्ख्यिों ने अच्छी तरह से पार परागण किया। इससे फुल जल्द झड़ गए। आसपास के किसान नाराज हो गए और फसल खराब होने का अरोप लगाने लगे। उन्हें छोटे बच्चों के माध्यम से बताना पड़ा कि परा परागण एक प्रक्रिया है जो फसल के लिए अच्छी है। बाद में जब फसल अच्छी हुई तब उन्हें ये समझ आया। ऐसी स्थिति न बनें इसके लिए किसान को खेती की पूरी जानकारी और समय-समय पर उसे लेकर नवाचारों का पता होना ही चाहिए।
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