Successful Indian - successfullindian

नाम - शिवांगी पाठक

पद - पर्वतारोही

जन्म तिथि - 10 जुलाई

स्थान - हिसार हरियाणा

कुछ अलग करने की चाह के साथ मजबूत इरादे मिल जाएं तो दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ाई की जा सकती है। हरियाणा के हिसार की शिवांगी पाठक इसका जीवंत उदाहरण हैं। मजबूत इरादों से महज 16 साल की उम्र में शिवांगी को एवरेस्ट पर चढऩे का गौरव प्राप्त हुआ। ये सबसे कम उम्र में एवरेस्ट चढ़ाई का रिकॉर्ड है। तिरंगा और भगवान गणेश की प्रतिमा हमेशा अपने साथ रखने वाली शिवांगी ने किलिमंजारों, माउंट एल्ब्रस पर भी चढ़ाई की। किलिमंजारों की चढ़ाई तो शिवांगी ने महज 32 घंटे में पूरी कर ली। नए साल में अब शिवांगी कुछ नए पर्वतों पर चढ़ाई की योजना तैयार कर रही है।
सबसे कम उम्र में माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई का रिकॉर्ड बनाने वाली शिवांगी का जन्म हिसार के पास हासी कस्बे में 10 जुलाई 2001 को हुआ। प्रारंभिक शिक्षा हांसी और इसके बाद हिसार में शिक्षा हुई। शिवांगी बताती हैं कि वह बहुत शरारती थी। उसकी शरारत की शिकायतें न सुनना पड़े इसलिए मां पीटीएम में नहीं जाती थी। शिवांगी की पढ़ाई में ज्यादा रूचि नहीं थी। नृत्य का शौक था और खेल पर हमेशा नृत्य को रखती थी। कक्षा दसवीं तक यही स्थिति रही। वे दसवीं तक खेल मैदान में नहीं उतरी, लेकिन जब पर्वतारोहण करने का ठाना तो फिर मैदान में उतरी। यहां अपनी फिटनेस से जुड़े व्यायाम, दौड़ लगाने लगी।
शिवांगी कक्षा दसवीं पास करने के बाद हिसार में ही अपनी मां के साथ पर्वतारोहरण से जुड़ी एक कार्यशाला में पहुंची। यहां पर्वतारोहण से संबंधित डॉक्यूमेंट्री फिल्म दिखाई गई। इसमें पर्वतारोहण के दौरान की दिक्कतें, तरीकों और अन्य तथ्य बताएं। शिवांगी ने पहली बार किसी विषय को इतनी गंभीरता से रूचि लेकर देखा- सुना। ये देख, उनकी मां हैरान थी। मां ने कहा, यदि इतनी रूचि आ रही है तो माउंट एवरेस्ट चढ़ जा। शिवांगी ने जवाब दिया, हां, माउंट एवरेस्ट पर ही चढना है। इससे ही उनके पर्वतारोही बनने की कहानी शुरू हुई।
कार्यशाला से घर लौटने के बाद शिवांगी कुछ दिन पर्वतारोहण के विचारों में ही गुम रही। मां से कहा, मुझे कैसे भी करके माउंट एवरेस्ट पर चढना है। मां को लगा शिवांगी इस मामले में गंभीर है तो उन्होंने भी मदद की। पर्वतारोहण को लेकर गुगल पर जानकारियां जुटाई। चढ़ाई कैसे करते हैं? इसके बारे में पता लगाया। शिवांगी के पास मोबाइल नहीं था तो दूसरों के मोबाइल से सर्च किया। अंतत: इससे जुड़े पाठ्यक्रम करने की सोची। शिवांगी पर्वतों पर रह सकती है या नहीं, इसका पता करने पिता ने शिवांगी को बंजी जंपिंग करने का सुझाव दिया। बंजी जंपिंग की तो आत्मविश्वास बढ़ा। ऊंचाई से डर को भी मन से निकाला और इसी क्षेत्र में आगे बढऩे लगी।
शिवांगी का कहना है कि 2018 में उनकी बोर्ड परीक्षा थी और इसी साल माउंट एवरेस्ट चढ़ाई के लिए तैयारी भी कर रही थी। तैयारी करने के दौरान काफी थकावट आती थी। ऐसे में मां उनके पास बैठकर पढ़ाती थी। वह राजनीतिक विज्ञान और इतिहास के नोट्स बनाकर सुनाती थी। मां से नोट्स सुनकर ही परीक्षा दी। इस दौरान वह स्कूल नहीं जा सकती थी, लेकिन मां के जो नोट्स बताए, उन्हें सुनकर परीक्षा पास की।
शिवांगी बताती हैं कि माउंट एवरेस्ट चढने विशेष कोर्स- ट्रेनिंग की जरूरत रहती है। उन्होंने इसके लिए सबसे पहले कश्मीर के संस्थान में प्रवेश लिया। इसके बाद दार्जलिंग- सिक्कीम से जुड़े संस्थान में कोर्स किया। यहां उन्हें एल्फा ग्रेड मिली। 2017 में कश्मीर और सिक्कीम के संस्थानों में पर्वतारोहण का कोर्स किया। लगातार मेहनत की। 22 किलो के करीब वजन कम किया। ट्रेनिंग के दौरान लंबे बाल भी दिक्कत दे रहे थे तो उन्हें भी छोटा करा दिया। कोर्स के दौरान दूध, ब्रेड, दाल, चावल, मशरूम दिया जाता था, ताकि प्रोटिन की बराबर मिलता रहे।
शिवांगी कहती है कि माउंट एवरेस्ट चढ़ाई के लिए सेवन सबमिट एजेंसी को आवेदन किया था। इसपर उन्हें जनवरी 2018 में माउंट एवरेस्ट चढ़ाई मंजूरी को पत्र आया। वे सबसे कम उम्र में एवरेस्ट चढ़ाई करने की स्थिति में थी इसलिए ये मंजूर हुआ। इसके बाद छह अप्रैल को चढ़ाई शुरू की। 16 अप्रैल को बेस कैंप तक पहुंचे। चढ़ाई के दौरान काफी दिक्कतें आई। रास्ते में पडऩे वाले खुंबू आईसफॉल ने उन्हें काफी डराया। खुंबू आईसफॉल को मौत का घर भी कहा जाता है। स्थिति ये रही कि वह कैंप एक से ही वापिस लौट आई। नीचे आई तो मां से कहा, बहुत खतरनाक है, लेकिन हिम्मत नहीं हारी, फिर शुरू किया और दूसरी बार में कैंप दो तक पहुंची। इन कैंप की दो फेरी लगाने में पंद्रह से अठारह दिन का समय लग गया।

Successful Indian - successfullindian

शिवांगी चढ़ाई के दौरान कैंप दो पर पहुंची। उन्हें कैंप तीन की ओर बढना था, लेकिन पानी खत्म हो गया। चढ़ाई के दौरान बर्फ खोदकर ही उसका पानी बनाकर उपयोग करते हैं, इसलिए उनके सहयोगी शेरपा ने कहा, बर्फ ले आओ। वह जब बर्फ खोदने लगी तो नीचे कुछ काली चीज नजर आई। आगे खोदा तो पता चला एक बहुत पुराना हाथ पड़ा है। वह म्घबरा गई। शेरपा ने कहा, आगे तो बॉडी भी मिल सकती है, घबराओ मत। इसके बाद इससे आगे बर्फ खोदा और फिर कैंप तीन के लिए बढ़े। शिवांगी कहती है कि शेरपा पहाड़ों पर आराम से रहते हैं। इन्हें मदद के लिए साथ ले जाते हैं। ये रास्ता दिखाने और सामान उठाने में मदद करते हैं। ये तीन से तीन बार एवरेस्ट चढ़ चुके होते हैं, इन्हें पूरी जानकारी होती है।
शिवांगी कहती है कि कैंप एक से दो के बीच उनकी गति बेहद धीमी थी। शारीरिकतौर पर दर्द हो रहा था। जीपीएस ट्रेकर से उनकी एजेंसी उनकी गति को ट्रैक कर रही थी। एजेंसी ने उन्हें वापिस नीचे आने का कहा। आगे खतरे की बात कही, लेकिन वह शून्य से 20 डिग्री कम तापमान के बीच चलती रही। अपना वॉकी टॉकी बंद कर दिया। चढ़ाई के दौरान असहनीय दर्द से वह रोई भी, लेकिन हिम्मत नहीं हारी और कैंप दो पर पहुंचकर वॉकी टॉकी चालू कर एजेंसी को बताया कि वह आगे बढ़ गई है।
शिवांगी का कहना है कि पर्वतारोहण के दौरान कम से कम दो लीटर पानी, ऑक्सीजन सिलेंडर, छोटे गैस सिलेंडर, हेलमेट, जरूरत का कुछ अन्य सामान के साथ अतिरिक्त ग्लब्ज और टीशर्ट भी रखते हैं। बर्फ में चलने, बैठने पर पसीना आता है। शिवांगी कहती है कि चढ़ाई के लिए सेवन सबमिट एजेंसी की मदद रही। एजेंसी को पता था, 16 साल की उम्र में एवरेस्ट पर जाने से रिकॉर्ड बनेगा, इसलिए मंजूरी व मदद की। इसका भुगतान करना पड़ता है। ये बेहद खर्चिला भी होता है। उनका करीब 35 लाख रुपए खर्च हुआ। ये एक तरह से सेल्फ प्रायोजित यात्रा रही। इस सफल पर्वतारोहण के बाद अब प्रायोजक मिलने लगे हैं। शिवांगी कहती है कि पर्वतारोहण करने वाले को पहली बार तो खुद के ही खर्च पर चढ़ाई करना पड़ती है।
शिवांगी ने एवरेस्ट पर 16 मई 2018 को एवरेस्ट पर चढ़ाई पूरी की। उस समय एवरेस्ट की ऊंचाई 8848 मीटर थी। नेपाल के काठमांडू की ओर से ये चढ़ाई शुरू की। कैंप तीन से आगे बढ़ी बढऩे पर उनके शेरपा के हाथ से उनका वॉकीटॉकी गिर गया। इससे उनका उनकी एजेंसी से कनेक्शन कट गया। पहाड़ के नीचे उनकी एजेंसी के सदस्य व परिजन शिवांगी को मृत मान चुके थे। हालांकि वह अपनी चढ़ाई जारी रखे हुए थे। करीब डेढ़ दिन वह लापता स्थिति में रही। एवरेस्ट पर तिरंगा लहराने के बाद जब वह लौटी तो कनेक्षन जुड़ा और सबको खबर दी, शिवांगी ने अपना लक्ष्य पूरा कर लिया है।
शिवांगी का कहना है कि पहाड़ चढ़ाई के लिए शारीरिक मजबूती फिटनेस तो होना ही चाहिए, मानसिकतौर पर भी व्यक्ति मजबूत हो। वे बताती है कि एवरेस्ट चढ़ाई के 40 दिन में से करीब 14 दिन वे नहीं सोई। लगातार 25 घंटे तक चढना पड़ता है। इसके साथ ही कभी बर्फबारी तो कभी गर्मी दिक्कत बनती है। मौसम का अचानक बदलाव भी परेशान करता है। इस दौरान एक जगह बैठकर मौसम के ठीक होने का इंतजार करना पड़ता हैं। मानसिक मजबूती के लिए योग और ध्यान बेहतर हैं। सिरदर्द, उच्च रक्तचाप, नाक, कान, मुंह से खून आना जैसी स्थितियां भी बनती हैं।
शिवांगी का कहना हैं कि उन्हें किसी से डर नहीं लगता। यही वजह है कि 18 वर्ष की उम्र में एवरेस्ट चढ़ाई के बाद 17 साल की उम्र तक 26 जुलाई 2018 को किलिमंजारों, 4 सितंबर 2018 को एल्ब्रश पर भी चढ़ाई पूरी की। वे बताती हैं जब सोचा हुआ काम नहीं होता हैं तो हौंसला टूटने लगता है, लेकिन मैं प्रयास बेहतर करने का सोचकर आगे बढ़ जाती हूं। किलिमंजारों की चढ़ाई तंजानिया की ओर से शुरू की और लगभग दौड़ते हुए इसे 32 घंटे में पूरा किया। इसपर उन्हें फास्टेस्ट यंगेस्ट का रिकॉर्ड बनाया।
शिवांगी हमेशा तिरंगा अपने साथ रखती हैं। भारत का राष्ट्रीय ध्वज देखकर ही उनमें ऊर्जा का संचार होता है। उनकी मां ने गणेश भगवान की मूर्ति दी थी। उन्हें वह अपना मामा मानती हैं और उनसे बात करते हुए हिम्मत बढ़ाती हैं। वे बताती हैं कि एवरेस्ट की चढ़ाई उनकी अब तक की सबसे कठिन चढ़ाई रही। अब फिर से चढ़ाई के लिए जाने की बात कह रही हैं। शिवांगी का कहना है कि मां, कोच रिंकू मेम उन्हें बहुत मदद करती हैं। इनसे वे प्रेरणा लेती है, प्रोत्साहन लेती है। भगवान में काफी विश्वास है।
शिवांगी का कहना है कि मुश्किलें आती रहती हैं, इनसे डरे नहीं। यदि आपका सपना सही हैं तो साफ नियत के साथ उसे पूरा करने पूरी मेहनत से प्रयास शुरू करें। आप आगे बढ़े और जोश जुनून बनाएं रखें सफलता अवश्य मिलेगी। शिवांगी का कहना हैं कि आपके माता पिता आपसे गर्व महसूस करें, यही खुद में बड़ी सफलता है। यदि आप खुद के कामों से दूसरों की मदद कर पाएं, दूसरों को खुश कर पाएं तो इससे बेहतर कुछ नहीं। अपनी महत्वाकांक्षा को अपनी हिम्मत बनाएं और आगे बढ़ जाएं।
  • 16 साल की उम्र में, वह नेपाल की तरफ से 16 मई 2018 को दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली भारत की सबसे कम उम्र की व्यक्ति बन गईं।
  • वह 2 सितंबर 2018 को यूरोप में रूस की सबसे ऊंची चोटी माउंट एलब्रस पर चढ़ गई।
  • उसने 24 जुलाई 2018 को 17 साल की उम्र में अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी माउंट किलिमंजारो पर भी चढ़ाई की।
  • उन्हें 22 जनवरी 2019 को भारतीय राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद द्वारा बाल शक्ति पुरस्कार 2019 से सम्मानित किया गया था।
  • Gallery





    Add a Comment