Successful Indian - successfullindian

नाम - सुयश जाधव

पद - भारतीय पैरा तैराक, जिला खेल अधिकारी

जन्म की तारीख - 28 नवंबर 1993

स्थान - सोलापुर

कक्षा छह में दोनों हाथ गवाएं, लेकिन हिम्मत बनाए रखी, तैराकी में अब तक 118 पदक प्राप्त कर चुके सुयश जाधव, तैराकी में पैरालंपिक खिलाड़ी
सफल पैरा स्वीमर सुयश जाधव टोक्यो पैरालिंपिक 2021 में भी देश का गौरव बढ़ाएंगे। वे देश के एकमात्र पैरा स्वीमर है, जिन्हें पैरालिंपिक कमेटी ऑफ इंडिया ने इस प्रतियोगिता के लिए चुना है। 24 अगस्त से 05 सितंबर तक आयोजित पैरालिंपिक में वे देश का प्रतिनिधित्व करेंगे। जाधव ने 2016 में रियो पैरालिंपिक में भी देश का प्रतिनिधित्व किया था। जाधव मूलत: महाराष्ट्र से हैं और वे अकेले ऐसे पैरा तैराक है जिन्हें लगातार दो पैरालिंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। वे यहां 50 मीटर बटर फ्लाई और 200 मीटर व्यक्तिगत पैरा स्वीमिंग में देश का गौरव बढ़ाएंगे। सक्सेसफुल इंडियन जाधव को उनके चयन पर बधाई देती है। इस सर्वोच्च प्रतियोगिता में सफलता प्राप्त करने की कामना करती है।

बचपन में एक दुर्घटना में अपने दोनों हाथ गंवाने के बावजूद तैराक सुयश जाधव पैरालंपिक में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम प्रतिष्ठित कर रहे हैं। इनकी लगन और कड़ी मेहनत का ही परिणाम हैं कि सरकार ने इन्हें खेल का सर्वोच्च अर्जुन पुरस्कार प्रदान किया। महज 27 साल की उम्र में राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय व राज्य स्तरीय तैराकी स्वद्र्धाओं में बेहतर प्रदर्शन कर 118 पदक जीत चुके हैं। इनमें से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पांच तो स्वर्ण पदक ही जीते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदकों की संख्या 37 हैं। इनकी तैयारी अब भी जारी हैं और टोक्यो पैरालंपिक में स्वर्ण पदक पर इनकी नजर है। उसके लिए कड़ी मेहनत- तैयारी कर रहे हैं।
28 नवंबर 1993 में महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में जाधव का जन्म हुआ। जाधव ने तैराकी तीन साल की उम्र से ही शुरू कर दी थी। पिता नारायण जाधव खुद एक अच्छे तैराक व तैराकी के कोच थे। उन्होंने ने ही सुयश को तैराकी सिखाई। पिता को वे अपना पहला गुरु मानते हैं। पिता का सपना था कि उनका बेटा एक दिन देश सबसे बेहतर तैराक बने और देश का नाम रोशन करें। आज सुयश उनके इसी सपने को पूरा करने के लिए मेहनत कर रहे हैं।
बचपन में तैराकी सीखने और बड़ा होकर तैराकी करने का सपना संजोएं, सुयश को 12 साल की उम्र में बड़ा झटका लगा। एक निर्माण स्थल पर अंजाने में बिजली के खुले तारों के संपर्क में आए। पंजे जल गए, हाथों पर गहरे घाव हुए, छह माह अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। सुयश को बचाने के लिए डॉक्टर्स को पंजे समेत हाथ के खराब हिस्सों को काटना पड़ा।
दुर्घटना बड़ी थी। सुयश को दोनों हाथ गंवाने पड़े, लेकिन इसका असर उनकी पढ़ाई और भविष्य के सपनों पर नहीं आने दिया। ठीक होने के बाद पढ़ाई शुरू की। कटे हाथ में बेल्ट लगाकर उसमें पेन बांधा। सबसे पहले कक्षा 7वीं की परीक्षा दी। पिता उनके तैराकी कोच के साथ टीचिंग भी कराते थे, जिससे उनका हौंसला बना रहा। स्थिति ये कि सभी परीक्षाओं में 70 फीसदी से 90 फीसदी तक अंक प्राप्त किए।
पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद 11वीं में विज्ञान विषय लिया। जब इसके प्रैक्टिकल और अन्य जरूरी प्रोजेक्ट्स से तैराकी के प्रशिक्षण पर असर हुआ तो फिर कला संकाय से आगे की पढ़ाई करना तय किया। सुयश का कहना है कि विज्ञान की पढ़ाई और तैराकी का प्रशिक्षण एक साथ नहीं हो सकता। इसका एहसास उन्हें हुआ। वे तैराकी के साथ पढ़ाई भी जारी रखना चाहते थे। कला संकाय से स्नातक की पढ़ाई शुरू की। पुणे से 2014 में कला संकाय से 70 फीसदी अंकों के साथ स्नातक किया।
सुयश जाधव ने 11वीं कक्षा में एक तैराकी स्पद्र्धा में पहली बार रजत पदक जीता था। इसके साथ ही उन्होंने तैराकी को अपने कैरियर के तौर पर लिया। इसके बाद ही उन्होंने अपनी पढ़ाई का संकाय बदला और कड़ी मेहनत शुरू की। 12वीं के बाद जब आगे की पढ़ाई के लिए पुणे आए तो यहां सुबह पांच बजे से तैराकी का प्रशिक्षण होता, फिर कॉलेज की पढ़ाई व कॉलेज का समय, उसके बाद फिर शाम को तैराकी का प्रशिक्षण। स्थिति ये कि सुबह पांच बजे से रात नौ बजे बिना रूके लगातार मेहतन करते। नतीजा आज 118 पदकों के साथ देश के बेहतर पैरालंपियन के तौर पर सबके सामने हैं।
सुयश 2007 से महाराष्ट्र स्टेट चैंपियन हैं। उनका समर्पण और मेहनत ही है कि बीते 13 साल से उनका ये तमगा कोई ओर नहीं ले सका। वे जितनी मेहनत शुरुआत में करते थे, आज भी उतनी ही करते हैं। सुयश का कहना हैं कि मन लगाकर प्रशिक्षण करते हैं। उन्हें इसमें मजा आता हैं। जब पूरा शरीर थककर चूर हो जाता है फिर भी वे प्रशिक्षण लेते रहते हैं, जिसका लाभ स्पद्र्धाओं में मिलता हैं। थकने के बावजूद वे तैराकी करते रहते हैं और यही उन्हें अन्य खिलाडिय़ों से बेहतर बनाता हैं।

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तैराकी में कैरियर बनाने की सोचने वालों के लिए सुयश एक बेहतर उदाहरण हैं। उनका कहना हैं कि तैराकी के दौरान पुल के अंदर शरीर बेहद थक जाता हैं और मन सोचने लगता हैं कि अब और नहीं बनेगा। ऐसे में मानसिक मजबूती दिखाना होती हैं। किसी भी कीमत पर यहां से खेल को नहीं छोडऩा। यही विचार दिमाग में चलते हैं और प्रदर्शन सुधर जाता है। यहीं जीत का मूल मंत्र भी हैं।
स्पद्र्धा आने के कम से कम चार माह पहले से तैयारी शुरू कर दी जाती हैं। चार माह, दो माह, आखिरी के पंद्रह दिन और स्पद्र्धा के दौरान। प्रशिक्षण को ऐसे भागों में बांट लेते हैं। डायटिंग सबसे बड़ी भूमिका निभाती है। सुयश कहते हैं कई बार एक ही रोटी खाते हैं। बाहरी खाना, तेलीय और इसी तरह का वसायुक्त भोजन व शीतलपेय पूरी तरह से प्रतिबंधित कर देते हैं। उनके प्रशिक्षण और स्पद्र्धा में भागीदारी कराने स्पोटर््स फाउंडेशन की स्कॉलरशीप ने बड़ा योगदान दिया।
सुयश कहते हैं, सामान्य तैराक के पास मतबूत हाथ और पंजे होते हैं। उनकी पानी में पकड़ मजबूत रहती हैं। मजबूत पकड़ के साथ तेजी से छलांग लगाकर दूरी तय करते हैं। मेरे पास पंजे नहीं है, इसलिए यहां पकड़ कमजोर हो जाती हैं। सामान्य तैराक और विकलांग तैराकी में इतना अंतर होता है। हालांकि कठिन प्रशिक्षण से इस अंतर को पाटने का प्रयास कर रहे हैं।
सुयश का कहना है कि लक्ष्य सबसे पहले स्पष्ट होना चाहिए। उसके अनुसार तैयारी शुरू करना चाहिए। शारीरिक के साथ मानसिक तैयारी भी करें। स्पद्र्धा के दौरान थकावट या निराशा होने लगे तो एक ही बात सोचिए, लक्ष्य तक पहुंचे बिना खेल छोडूंगा नहीं। शरीर और दिमाग को इसकी आदत डालें तो सफलता आपसे दूर नहीं हो सकती। सुयश का कहना है कि परेशानी, कठिन स्थिति सबके जीवन में आती हैं, लेकिन उस समय काम को छोडऩा नहीं चाहिए। उसे पूरा करने में जी जान से लग जाएं तो हम सफल होते हैं। सुयश का कहना है कि हमने जो कठिन मेहनत की, प्रशिक्षण लिया उसके बाद हम अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं तो वो सफलता है। समाज में अपना नाम, पहचान और परिवार को उनकी खुशियां मिल जाएं तो समझों हम सफल हैं।
  • रिओ- पैरालंपिक 2016 में 50 मीटर फ्री स्टाइल तैराकी स्पद्र्धा में नौवां स्थान प्राप्त किया
  • रिओ- पैरालंपिंग 2016 में 200 मीटर तैराकी स्पद्र्धा में 10वां स्थान प्राप्त किया
  • एशियन पैरा गेम्स 2018 इंडोनेशिया में स्वर्ण पदक के दो कांस्य पदक जीते।
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अब तक पांच स्वर्ण, नौ रजत समेत 21 पदक जीते। राष्ट्रीय स्पद्र्धाओं में 37 स्वर्ण, छह रजत समेत 46 पदक जीत चुके हैं।
  • अर्जुन पुरूस्कार से इन्हें सम्मानित किया गया।
  • अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय स्पद्र्धाओं में अब तक कुल 118 पदक जीत चुके हैं।
  • पैरालिंपिक 2021 भारत का अकेला पैरा तैराक | पैरालिंपिक (रियो 2016) मैं भी भारत का प्रतिनिधित्व किया था और (टोक्यो 2021) भारत का प्रतिनिधित्व कर रहा हु।
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