Successful Indian - successfullindian

नाम - उषा विश्वकर्मा

पद - रेड ब्रिगेड संस्था

जन्म तिथि - 10 मई

स्थान - लखनऊ

लड़कियों को कमजोर समझकर उनके साथ छेड़छाड़ करने वालों के खिलाफ लखनऊ की ऊषा विश्वकर्मा अपनी निशस्त्र कला तकनीक के साथ दीवार बनकर खड़ी है। बीते दस साल में वह आत्मरक्षा की इस कला से 1.70 लाख लड़कियों को प्रशिक्षित कर चुकी। ये सिलसिला अब भी जारी है। 33 साल की उषा विश्वकर्मा खुद छेड़छाड़ का शिकार हो चुकी है इसलिए इस दर्द को भलीभांति समझती है। अन्य लड़कियां इसका शिकार न हो, इसके लिए ही उन्होंने रेड ब्रिगेड नाम से प्रशिक्षित लड़कियों की पूरी सेना तैयार कर दी। आत्मरक्षा के लिए निशस्त्र कला विकसित की। राष्ट्रीय स्तर पर स्कूल, कॉलेज, संस्थानों, गांवों में शिविर लगाकर लड़कियों को प्रशिक्षित कर रही है। उषा का मानना है कि इससे लड़कियों का आत्म विश्वास मजबूत हो जाता है। उनका देखने, सोचने, चलने और बात करने का तरीका बदल जाता है। स्थिति ये बन जाती है कि यदि कोई लडक़ा फब्ती कसने का छेडऩे का प्रयास करता है तो वे उसे अपने हावभ्भाव से ही भगा सकती है। यदि हाथापाई की नौबत आई तो भी लडक़े पर भारी ही पड़ेगी। उनके इस गुर से कई लड़कियों को खुद को बचाया और फोन लगाकर उषा को धन्यवाद भी दिया।
ऊषा विश्वकर्मा का जन्म उत्तरप्रदेश के बस्ती जिले में हुआ, लेकिन शिक्षा लखनऊ में हुई। उनके पिता कारपेंटर है। चार बहन व एक भाई में वे सबसे बड़ी है। 2006 तक शिक्षा से जुड़े अभियान में काम करती थी, लेकिन इसी साल उनके एक सहकर्मी ने दुराचार का प्रयास किया। इससे वे अवसाद में चली गई। डेढ़ साल बाद जब वे अवसाद से बाहर आईं तो तो लड़कियों की मजबूती के लिए काम करना शुरू किया। दस साल से वे ये प्रशिक्षण देकर लड़कियों को मजबूत करने का काम कर रही है।
छेड़छाड़ से पीडि़त लड़कियों के लिए उषा ने शुरुआत में प्रदर्शन, रैलियां, जागरूकता अभियान जैसे काम किए। ये कारगर साबित नहीं हुए तो उन्होंने लड़कियों को इससे लडऩे आत्मरक्षा के गुर सिखाने की सोची। इसके लिए मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग ली। इससे उन्होंने खुद की प्रशिक्षण तकनीक विकसित की। इसे निशस्त्र कला का नाम दिया। चार दिन का ट्रेनिंग कोर्स तैयार किया। सात सदस्यों की टीम मिलकर ये ट्रेनिंग देती है।
ऊषा बताती है कि शुरुआत में सिर्फ 15 लड़कियां उनके ग्रुप में थी। विरोध प्रदर्शन से काम नहीं बना तो संस्था बनाई। लाल और काले रंग का ड्रेस कोड तैयार किया। इस ड्रेस कोड पर फब्तियां कसी गई तो उन्होंने संस्था का नाम ही ड्रेस कोड के आधार पर रेड ब्रिगेड रख दिया।

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ऊषा का कहना है कि प्रशिक्षण में सुरक्षा, इतिहास और आत्मविश्वास इन तीन बातों का समन्वय किया गया हैं। सबसे पहले लड़कियों को महिलाओं की ताकत, उनके मजबूत इतिहास से परिचित कराते हैं, ताकि उन्हें कमजोर होने का भाव न हो। वे खुद को मजबूत समझे। इस स्थिति में आने के बाद आत्मविश्वास बढ़ता है और वे आत्मरक्षा के गुर सिखने को तैयार रहती है। वे कहती है, महिलाओं का देश में गौरवपूर्व इतिहास हैं और वे इसे सामने लाने की पूरा प्रयास कर रही है।
ऊषा बताती है कि वे पंजाब में एक जगह ट्रेनिंग देकर लौटी थी। अगले दिन वहां से फोन आया और धन्यवाद कहा। पूछने पर पता चला, दो बदमाश एक लडक़ी के आगे हाथ लगाकर पर्स छीनकर भाग गए। लडक़ी ने उनका एक किमी तक पीछा किया और अकेले दम पर संकरी गली में दोनों बदमाशों को धरदबोचा। आसपास वालों की मदद से उन्हें पुलिस के हवाले किया। लखनऊ में सरकारी स्कूल की एक लडक़ी ने छह माह से परेशान कर रहे लडक़े को इसी निशस्त्र कला प्रशिक्षण के बाद सरेआम सबक सिखाया। इसके बाद लडक़े ने पीछा करना छोड़ दिया।
ऊषा का कहना है कि परिस्थिति के अनुसार योजना तैयार करना होती है। हम प्रशिक्षण में ये सोचकर तकनीक सिखाते है कि लडक़ी पांच से दस सेकंड के बीच सामने वाले को चित्त करें या वहां से निकलने में सफल हो जाए। इसके लिए फुर्ती और आत्मविश्वास, अंदर की ताकत बेहद जरूरी होती है। वे स्कूल, कॉलेज, संस्थानों से लेकर फैक्ट्रियों तक में प्रशिक्षण के लिए जाती है। ट्रेनिंग का कोई शुल्क तय नहीं है। उनके साथ रहने वाली लड़कियों को स्कूल व रहने का खर्च निकल जाए, इसके लिए डोनेशन की बात जरूर करते हैं।
ऊषा का कहना है कि जब भी लडक़ी छीपकर और नजरें नीची करके चलने की कोशिश करती है, सामने वाले की हिम्मत उतनी ही बढ़ती है। ऐसे में सबसे पहले तो लड़कियों को सीधे पूरे आत्मविश्वास से नजरें उठाकर चलने का कहते हैं। इससे ही आधी जीत पक्की हो जाती है। उन्हें हावभाव, आंखों का इस तरह प्रयोग करना बताते है कि छेड़छाड़ करने वाले की हिम्मत टूट जाए। वह खुद ही वहां से निकल जाए। उनका कहना हैं कि हाथापाई की नौबत तो सबसे आखिर में आती है। 13 साल से अधिक उम्र की स्वस्थ लडक़ी का प्रशिक्षण के लिए नामांकन करती है।
ऊषा का कहना है कि औरतों का कोई संगठन नहीं है। ऐसे में वे रेड ब्रिगेड के तहत औरतों का राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा संगठन बनाने की योजना बना रही है। इससे औरतों को मजबूती मिलेगी, उनकी आवाज उठाई जा सकेगी। औरतों को खुद का इतिहास पता होना जरूरी है। प्रशिक्षण की शुरुआत ही वह महिलाओं के इतिहास को बताकर करती है। वे ऑनलाइन प्रशिक्षण नहीं देती, क्योंकि जमीनी स्तर पर ही इसका प्रशिक्षण दिया जा सकता है।
ऊषा का प्रशिक्षण समय तीन से चार दिन का है। वे लड़कियों को प्रशिक्षक बनने की ट्रेनिंग भी देती है। प्रशिक्षक बनने वाली लड़कियों को लखनऊ में तीन से छह माह तक उनके साथ रखते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों से उनके प्रशिक्षक बनने का प्रशिक्षण लेने महिलाएं, लड़कियां आती है। वे बताती है कि जितनी अधिक लड़कियों तक ये प्रशिक्षण पहुंचेगा, उतना ही महिलाओं- लड़कियों के लिए बेहतर होगा।
ऊषा कहती है कि पुरूष और महिला के काम अलग-अलग है। महिलाएं पुरूषों से स्पद्र्धा न करें। महिलाओं की इज्जत और गर्व शुरू करें। जो काम पुरूष नहीं कर सकते, महिलाएं कर सकती है। जब वे खुद के महिला होने पर गर्व करेगी तो उनकी सोच के साथ काम करने के तरीके बदलेंगे। उनके अंदर की ताकत बढ़ेगी, जिससे उनके साथ कोई गलत हरकत नहीं कर पाएगा। ऊषा कहती है कि उनका संगठन डोनेशन पर चलता है इसलिए लोगों को उनकी मदद के लिए आगे आना चाहिए, ताकि महिलाओं की सुरक्षा का प्रशिक्षण लगातार जारी रहे और बढ़ता रहे।
  • 100 वि जेता महि ला वि जेता पुरस्कार 2016 में भारत के राष्ट्रपति ने प्रदान कि या
  • रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार 2016 में उप्र सरकार नेप्रदान कि या
  • महि ला उपलब्धि परु स्कार 2014 में मबंु ई यवु ा सशक्ति करण द्वारा दि या गया
  • गृह लक्ष्मी दूत पुरस्कार 2013 में गृह लक्ष्मी नई दि ल्ली द्वारा
  • फि लि प्स गॉडफ्रे राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार 2013 मेंनई दि ल्ली की माइंड ऑफ स्टील स्पेशल अवार्ड द्वारा दि या गया
  • रेड एफएम बडे दि लवाले पुरस्कार 2013 में रेड एफएम लखनऊ की ओर से दि या गया
  • दि देवी अवार्ड 2019 में उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदि त्यनाथ ने प्रदान कि या
  • फोब्र्स 2020 पुरस्कार
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