Successful Indian - successfullindian

नाम - वेंकटरमण सिंह श्याम

पद - गोंड कलाकार

जन्म की तारीख - 28 अक्टूबर 1970

स्थान - भोपाल

भित्तीचित्र की गोंड कला को बचाने गांव छोड़ा, आज विश्व में मिली पहचान इंट्रो- भित्तीचित्र की गोंड कला के 20 हजार साल से अधिक पुराने अस्तित्व को बचाने मंडला जिले के सिझोरा में जन्मे वेंकट रमन सिंह श्याम ने लंबी लड़ाई लड़ी। छोटे से गांव से निकले वेंकट रमन सिंह ने संघर्ष करते हुए इस प्राचीन कला को देश के साथ विदेशों में प्रसिद्ध कराया। उनका संघर्ष जारी है। वे कहते हैं, हर जन तक इस कला को पहुंचाना है, ताकि गोंड कला विश्व में देश का नाम ऊंचा कर सकें। लोग हमार समृद्ध कला इतिहास और परंपरा को जान व समझ सकें।
दो दिसंबर 1970 में जन्मे वेंकट रमन सिंह श्याम का बचपन में ही अपने कुल की इस भित्ती चित्रकला के प्रति समर्पण भाव था। गांव में महज सात से आठ साल की उम्र में ही कभी चारकोल तो कभी बांस की कूची- लकड़ी से चित्रकारी किया करते। समय के साथ इस कला के प्रति जागरूकता- सपर्मण बढ़ा, लेकिन ये कुछ ही लोगों के बीच एक दायरे में सिमटी थी। आमजन में इसे लेकर कोई उत्साह- रूचि नहीं थी। ऐसे में अपनी पुरातन परंपरा और संस्कृति के अहम हिस्से को बचाने गांव छोड़कर वे भोपाल में आए। जीवनयापन की जरूरतों के लिए कठिन समय से गुजरे। एक वक्त ऐसा भी आया, जब इस घर वापसी की स्थिति बनी। लेकिन संयम और संषर्घ ने समय को बदला। आज भित्तीचित्र की गोंड कला देश के साथ विदेशों में नाम कमा रही है। इसपर पीएचडी की जा रही है। डॉक्यूमेंट्री व एनीमेशन फिल्म भी बन रही। कई पुस्तकें भी बाजार में आई जो भारत की इस पुरातन कला के प्रति लोगों की जिज्ञासाओं को शांत कर रही है। यूएस से लेकर स्कॉटलैंड और अन्य देशों में इसके लिए अब विशेष प्रदर्शनी लगाई जा रही है। इसमें वेंकट रमन सिंह श्याम नित नए प्रयोग कर इसे नए रंगों से कैनवास पर उकेरते हुए दीवारों पर लगा रहा है। उनका मानना है कि नए प्रयोग और कुछ हटकर करना व समय के साथ कला में भी बदलाव करने से ये समकालीन कला लोगों के लिए समाज के लिए प्रासंगिक बनी रहेगी।
वेंकट रमन सिंह श्याम महज 16 साल की उम्र में भोपाल आ गए। यहां उनके अंकल जनगण सिंह इस कला के एकमात्र जानकार थे। उनके सहायक के रूप में वेंकट रमन सिंह भोपाल में काम करने लगे। उनका प्रारंभिक शिक्षा कक्षा दसवीं तक गांव में ही हुई। करीब ढाई साल तक अंकल के सहायक के तौर पर काम करने के बाद उन्होंने दिल्ली की राह पकड़ी। वहां उन्हें स्वामीनाथन और उन्हीं की तरह के अन्य बड़े कलाकारों की संगति का मौका मिला।
श्याम ने अपने अंतरमन से ही कला का ज्ञान प्राप्त किया। बचपन से ही वे इससे जुड़े चुके थे। अंकल का सानिध्य मिला, लेकिन प्रेरणा खुद से ही ली। खुद ही अपनी परंपराओं- लोककथाओं को विचारते हुए भित्तिचित्र उकेरने के नित नए प्रयोग करते, सीखते। ऐसे ही धीरे-धीरे कला की परिपक्वता आई। रंगों की समझ विकसित की। काम करते हुए ही उन्होंने इसकी बारिकियों को सीखा। वेंकट रमन ङ्क्षसह बताते हैं कि दीवारों या जहां कहीं भी स्थान मिलता तो वे इस गोंड कला के चित्र को उकेरने लगते। उनकी मां उन्हें उनके मामाजी का पुनर्जन्म मानती थी।
वेंकट रमन सिंह बताते हैं कि गोंड कलाकारी की किसी को अधिक जानकारी नहीं थी। उनके अंकल जनगण ङ्क्षसह ही इस कला के एकमात्र कलाकार थे। जब वे दिल्ली पहुंचे और वहां कलाकार स्वामीनाथन जी से चर्चा हुई तो उन्होंने बताया ये समकालीन कला हैं। इससे पहले उन्हें इसका पता नहीं था। वे जीवनयापन के लिए पेंटिंग करने वाले श्रमिक का काम भी करते थे। घरों व भवनों की रंगाई पुताई करते थे, लेकिन अपनी कला को नहीं छोड़ा।
वेंकट रमन सिंह तमाम दिक्कतों के बावजूद अपने काम में लगे रहे। लगातार काम करने का ही नतीजा रहा कि वे सरकार की नजरों में आए और उन्हें 2002 में मप्र सरकार की ओर से स्टेट अवार्ड दिया गया। इसका लाभ ये हुआ कि उन्हें सरकारी मेलों में अपनी कला की प्रदर्शनी लगाने के मौके मिलने लगे। यहां पेंटिंग बिकी तो नहीं, लेकिन लोगों के सामने रखने से लोगों के मन में उनके प्रति जागरूकता बढऩे लगी।
श्याम भित्तीचित्र की गोंड कला का काम लगातार करते रहे। मौका मिलने पर प्रदर्शनियों में जाते रहे। जीवनयापन के लिए बिल बोर्ड- साइनबोर्ड पेंटिंग करते रहे। उन्होंने कुछ युवकों को अपने सहायक के तौर पर भी काम पर रखा। प्रदर्शनियों से प्रचार हुआ तो खुद ही 2010 में इस कला को गोंड कला के नाम से पुकारा जाने लगा। ये लोगों ने ही नाम दिया।

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वेंकट रमन सिंह श्याम बताते हैं कि वे कला संरक्षण और खुद को इसमें स्थापित करने के लिए संघर्ष कर ही रहे थे कि 2001 में उनके अंकल जनगण सिंह की मृत्यु हो गई। गोंड कला में काम कर रहे उनके साथ अन्य गांव वालों के लिए ये बड़ा झटका था। आधार स्तंभ ढहने के समान था। इसके बाद 2001 से 2003 तक बेहद कठिन समय रहा। पिताजी ने गांव लौट आने का कह दिया, लेकिन संघर्ष की जिद की वजह से वे बने रहे। जीवनयापन तक कठिन हो गया था।
वेंकट रमन सिंह ने 2004 में दिल्ली में आयोजित प्रदर्शनी में अपनी कलाकृति को रखा। यहीं से एक बार फिर नई शुरुआत हुई। कई अखबारों में इसके बारे में आर्टिकल आए। गोंडकला के प्रति लोगों की जागरूकता रूचि बढ़ी। उन्हें इसी साल बर्सिलोना जाने का मौका मिला। वहां गोंड कला का प्रदर्शन किया। स्कॉटलैंड की टीम आई और एनीमेशन फिल्म बनाई। ये बेहद सफल रही। यूके फिल्म फेस्टिवल में इसके लिए अवार्ड लेने आमंत्रित किया गया। 2005 में इसपर पुस्तक का प्रकाशन भी हुई। गैलेरीज में ये पेंटिंग रखी गई। समालोचकों की टिप्पणियों से लोगों में इस कला के प्रति जानकारी बढ़ी। सरकार की प्रदर्शनियों में कला को प्रमुखता से रखा जाने लगा। ये बिकने भी लगी। सरकारी अफसरों व अन्य बड़े लोगों ने अपने घरों में भित्तीचित्र की इस कला को उकेरने का मौका भी दिया, इससे भी प्रचार हुआ।
वेंकट रमन सिंह का कहना है कि गोंड कला पूरी तरह प्रकृति के करीब रहने की कला है। वे प्रकृति से ही सीखते हैं। वही पाठशाला है। भित्तीचित्र की डिजाइन के लिए खुद कुछ नया नहीं सोचते, वे किवदंतियों, वाचक परंपरा से ही पात्र और कहानी उठाते हैं। उसपर मंथन करते हैं। सीन तैयार करते हैं। जब वे किसी कहानी पर विचार करते हैं तो पात्र दिखते हैं, उनका चरित्र दिखता है और वे फिर रंगों के माध्यम से उकेरते हैं।
उनका कहना है कि वे सबसे पहले ड्राइंग पर काम करते हैं। चार तरह के कांसेप्ट प्लान तैयार किए जाते हैं। विषय चुनने के बाद उसकी ड्राइंग तैयार करते हैं। कलर पर काम करते हैं। मन ही मन पात्र और चरित्र चित्रण होने लगता है। विषय वस्तु हमेशा प्रकृति ही होती है। वे ध्यान रखते हैं कि जो आकृति बनाएं वह दिखने में सुंदर लगे। एक चित्र को बनाने में सात दिन से लेकर एक साल या कई बार उससे भी अधिक समय लग सकता है।
वेंकट रमन सिंह का कहना है कि भित्तीचित्र पहले मिट्टी की दीवारों पर बांस की कूची और प्राकृतिक रंगों से किए जाते थे। लेकिन अब समय के बाद इसमें काफी आसानी हो गई है। अच्छे ब्रश के साथ नए व बेहतर आर्किलिक कलर का उपयोग भी किया जाता है। प्राकृतिक मिनरल कलर, क्ले कलर को पेपर पर तो उकेरा जा सकता है, लेकिन कैनवास और लंबे समय पर बने रहने के लिए आर्किलिक रंग का उपयोग होता है। उनका कहना हैं कि पेंटिंग की कीमत वे खुद तय करते हैं। कई बार जहां इन्हें प्रदर्शित किया जाता है वह गैलेरी भी कीमत तय देती है।
वेंकट रमन सिंह श्याम ने मुंबई हमलों को गोंड कला से चित्रों में उकेरा। ये उनकी सबसे प्रसिद्ध चित्रकारी रही। वे बताते हैं कि वे खुद इसके साक्षी रहे, इसलिए बेहतर परिकल्पना कर पाए। गोंड कला को समझाने खुद श्याम ने दो किताबें लिखी है। वे प्रदर्शनियों में इन्हें ले जाते हैं। इनमें गोंडकला को लेकर सभी जानकारियां हैं, जो दर्शकों की जिज्ञासा को शांत करती है।
श्याम बताते हैं कि गोंड कला के प्रति लोगों की रूचि और जागरूकता पहले से काफी बढ़ी है, लेकिन अब भी काफी काम करने की जरूरत है। अब भी इस हजारों साल पुराने कला को वैसा स्थान नहीं मिल पाया है। उन्होंने परिवार के साथ गांव में युवकों को प्रशिक्षण दिया है। कई कार्यक्रमों में इसके बारे में सिखाया। निजी तौर पर भी इसका प्रशिक्षण देते हैं, लेकिन इसमें अब पायरेसी व दुरूपयोग बढऩे लगा है। वे इसे पेटेंट कराना चाहते हैं, ताकि गोंड समुदाय के लोगों का हक कोई अन्य न छीन पाए।
गोंड कला वास्तव में गौत्र चिन्ह हैं, जो दरवाजों पर उकेरे जाते थे। ये चिन्ह उस परिवार की पहचान होते थे। गोंड समाज में साढ़े सात सौ गौत्र हैं और सबके अलग चिन्ह हैं। ये प्रकृति से जुड़े हुए हैं। ये गोंड समुदाय की कहानियों का हिस्सा हैं। बाहरी लोगों को इन कहानियों का पता नहीं होता है। ऐसे में कला के दुरूपयोग की आशंका बढ़ जाती है। वे कहते हैं कि इस कला की पहचान बनाए रखना पड़ेगी। आजीविका के लिए इस पर ही निर्भर है।
वेंकट रमन सिंह श्याम बतौर गोंड कलाकार लोगों को सलाह देते हैं कि कोई भी काम हो पूरी ईमानदारी, निष्ठा, लगन से करें। काम में निरंतरता बनाए रखें। नकल न करें। खुद की प्रतिभा को निखारें। सफलता के लिए कड़ी मेहनत की जरूरत होती है। प्रकृति हमें सीखाती है की व्यक्ति को अपने काम, अपनी पहचान पर कायम रहना चाहिए।
वेंकट रमन सिंह कहते हैं कि अन्य कलाकारों से अलग दिखने के लिए वे अपने काम में निरंतर बदलाव करते रहते हैं। काम में बदलाव के लिए उसमें कुछ नया जोडऩे की कोशिश भी करते हैं। कला वही है, उसका प्रस्तुतिकरण बदल जाता है और यही उनकी सफलता का मूलमंत्र भी है। सफलता के लिए संघर्ष जरूरी है। बिना थके, मन को उत्सुक रखकर काम करते रहें। सफलता अवश्य मिलेगी।
  • ओजस कला पुरस्कार 2015
  • कारीगर संस्कृति पुरस्कार कोलकाता (डब्ल्यूबी) 2010
  • इनवर्नेस फिल्म फेस्टिवल स्कॉटलैंड 2007 की सबसे लंबी कहानी प्रतियोगिता ट्रॉफी
  • उन्हें 2002 में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा राज्य हस्त शिल्पा पुरस्कार से सम्मानित किया गया था
  • ढाका कला शिखर सम्मेलन (संप्रभु शब्द) 2-9 फरवरी 2018
  • दलित लेखक उत्सव संगोष्ठी, मोनाश विश्वविद्यालय, मेलबर्न ऑस्ट्रेलिया २०१६
  • APT8 (एशिया प्रशांत त्रैवार्षिक 8) क्वींसलैंड आर्ट गैलरी क्वींसलैंड ब्रिस्बेन ऑस्ट्रेलिया नवंबर 2015
  • वर्जीनिया टेक ब्लैक्सबर्ग, यूएसए 2015 में संगोष्ठी
  • कनाडा ओटावा की राष्ट्रीय गैलरी में संगोष्ठी १७ मई २०१३
  • आईएनडी अहमदाबाद सितंबर 2012 में एनिमेशन कार्यशाला
  • रचना संसद स्कूल ऑफ फैशन एंड टेक्सटाइल डिजाइन मुंबई 2010 के लिए पेंटिंग वर्कशॉप
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